तिपुरा की नदियाँ: जो मैं वहाँ जाकर महसूस कर पाया

जब मैं तिपुरा के बारे में सोचता हूँ, तो सबसे पहले दिमाग में शांति आती है। ऊँचे-नीचे पहाड़, हरियाली, और उनके बीच से चुपचाप बहती नदियाँ। तिपुरा में नदियाँ सिर्फ पानी की धार नहीं हैं, ये यहाँ के लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। कोई किसान इन्हीं नदियों के भरोसे अपनी फसल उगाता है, तो कोई शहरवासी इन्हीं से पीने का पानी पाता है।

गोमती नदी

मनु नदी

खवाई नदी

हावड़ा नदी

फेनी नदी

मुहुरी नदी

लोंगाई नदी

जूरी नदी

देव नदी

सबसे पहले बात करूँ गोमती नदी की।

स्थानीय लोग इसे यूँ ही नहीं तिपुरा की जान कहते। गोमती नदी दुंबूर झील से निकलती है और बहुत दूर तक लोगों का सहारा बनती है। मैंने देखा है कि इसके किनारे की ज़मीन कितनी उपजाऊ होती है। इसी नदी पर बना दुंबूर हाइड्रो प्रोजेक्ट तिपुरा को बिजली भी देता है। गोमती सिर्फ बहती नहीं है, बल्कि तिपुरा को आगे बढ़ाती है।

मनु नदी की बात अलग है।

बरसात में लोग इसका नाम सुनते ही थोड़ा घबरा जाते हैं। पानी तेज़ी से बढ़ता है और बाढ़ का डर बना रहता है। लेकिन वही मनु नदी गर्मी में खेतों को ज़िंदा रखती है। यहाँ के किसान जानते हैं कि मनु से दूरी नहीं बनाई जा सकती, बस उसके साथ समझदारी से रहना पड़ता है।

अब अगरतला की तरफ आएँ, तो खवाई नदी से सामना होता है।

यह नदी शहर के बिल्कुल पास बहती है। मैंने लोगों को कहते सुना है कि खवाई ज़रूरत भी है और परेशानी भी। बारिश में यही नदी अगरतला के लिए मुश्किल बन जाती है, लेकिन पूरे साल यही नदी शहर की जल निकासी संभालती है।

अगरतला की प्यास बुझाने वाली नदी है हावड़ा।

हावड़ा नदी के बिना राजधानी की कल्पना करना मुश्किल है। लेकिन सच कहूँ, तो लोग अब इसके प्रदूषण को लेकर चिंतित हैं। शहर बढ़ रहा है और नदी पर दबाव भी। फिर भी, हावड़ा आज भी अगरतला के लिए बहुत अहम है।

फेनी नदी कुछ अलग ही कहानी कहती है।

यह नदी सिर्फ तिपुरा की नहीं, बल्कि दो देशों को जोड़ती है। भारत और बांग्लादेश के बीच बहती यह नदी बताती है कि पानी की कोई सीमा नहीं होती। यहाँ के लोग इसे राजनीति से ज़्यादा ज़िंदगी से जोड़कर देखते हैं।

जूरी नदी का बहाव शांत है, बिल्कुल यहाँ के लोगों की तरह।

यह नदी चर्चा में नहीं रहती, लेकिन जिन गांवों से यह गुजरती है, उनके लिए बहुत कीमती है। खेती हो या घरेलू काम, जूरी नदी चुपचाप सब संभालती रहती है।

लोंगाई नदी सीमावर्ती इलाकों की साथी है।

बरसात में यह उफनती है और लोगों की परेशानी बढ़ा देती है, लेकिन यही नदी साल के बाकी समय उनके लिए जीवन का सहारा बनती है। यहाँ के लोग जानते हैं कि नदी से लड़ना नहीं, उसके साथ जीना होता है।

और अंत में देव और मुहुरी जैसी छोटी नदियाँ।

इनका नाम कम सुनाई देता है, लेकिन गाँवों में इनकी अहमियत बहुत ज़्यादा है। ये नदियाँ दिखने में छोटी हैं, पर इनके बिना कई इलाकों में ज़िंदगी ठहर सी जाएगी।

आख़िर में बस इतना

तिपुरा की नदियाँ मुझे यही सिखाती हैं कि असली ताकत शोर में नहीं, निरंतर बहते रहने में होती है। ये नदियाँ यहाँ के लोगों की मेहनत, सहनशीलता और उम्मीदों की तरह हैं — कभी शांत, कभी उफनती हुई, लेकिन कभी रुकती नहीं।

अगर इन नदियों का ध्यान रखा गया, तो तिपुरा हमेशा हरा-भरा और ज़िंदा रहेगा।


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